Saturday, November 13, 2010

मै आपने शहर बिलासपुर से बहुत प्यार करता हु मै भी चाहता हु की मेरा बिलासपुर भी ऐसा ही बने जिस के लिए मै जो प्रयास कर सकता हु करूँगा .वैसे  तो मैं कभी किसे के लेख को कॉपी नहीं करता पर आज अहमदाबाद जिन्दाबाद कहने पर मजबुर होगया हु और मैं ईस लेख के लेखक को भी सलाम करना चाहता हु जिन्होंने इतनी खूबसूरती के साथ यह लेख लिखा है ...मुझे लगा की मैं कही टीवी पर अहमदाबाद की विकास यात्रा पर कोई फिल्म देख रहा हु बहुत सुंदर लेख ....
 जब हिरोशिमा और नागासाकी में बम गिरा था उस के  बाद  वहा के लोग और वह के प्रशासन से जो विकास किया.वो काबिले तारीफ है . आज जापान की तरक्की सब के सामने है ईस लेख से मुझे जापानियों की मजबूती और विस्वास और काम के प्रति समर्पण की बाते जो मैंने पढ़ी है वो  याद आती है ! ऐसा ही कुछ गुजरात के लोगे ने किया है ...अहमदाबाद जिन्दाबाद ..अहमदाबाद के लोग जिन्दाबाद....अहमदाबाद का प्रशासन जिन्दाबाद  और गुजरात की सरकार जिन्दाबाद 

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 बात वर्ष 2000 की है। आईआईएम-ए ने ‘अहमदाबाद ए डाइंग सिटी ऑफ ट्वेंटी फस्र्ट सेंच्युरी’ नाम से केस स्टडी तैयार की थी। संभवत: इसका आधार पूरब का मैनचेस्टर कहे जाने वाले अहमदाबाद के सितारों का गर्दिश में होना था। कारण, तब गुजरात के इस मुख्य शहर का वैभव धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा था। 

मिलों की चिमनियां जमींदोज हो चुकी थीं, अधिकांश मिलें वित्तीय संकट की गिरफ्त में फंसी थीं, यानी शहर की रीढ़ कही जाने वाली टैक्सटाइल्स व मैन्यूफैक्चरिंग इंडस्ट्री की इमारत ताश के महल की भांति जमीन पर आ गिरी थी। 

‘ग़रीबी में आटा गीला’ वाली कहावत की तर्ज पर जनवरी 2001 में आए विनाशकारी भूकंप ने अहमदाबाद की हालत और खस्ता कर दी। बड़े पैमाने पर जानमाल का नुक़सान हुआ। अनेक इमारतें ध्वस्त हो गईं। रियल एस्टेट सेक्टर में फ्लैट के भाव टूट कर निचले स्तर पर आ गए। 

अहमदाबाद के विभिन्न इलाक़ों में जमीनों के भाव बढ़े, लेकिन बंगला और सोसायटी बनाने हेतु पर्याप्त बुनियादी संरचना नहीं थी। भूकंप के बाद के झटके शहर की जिजीविषा की कठिन परीक्षा ले ही रहे थे कि गोधरा कांड हो गया। अहमदाबाद में 21वीं सदी के सबसे भयंकर सांप्रदायिक दंगे भड़क गए। 

अहमदाबाद हिंदू-मुस्लिम की स्पष्ट और गहरी खाई में विभाजित हो गया। अहमदाबाद की यह हालत क्या आईआईएम द्वारा दी गई ‘मरते शहर’ की उपमा को सही साबित नहीं करती कि राज्य का यह मुख्य शहर अपने अस्तित्व के ख़ात्मे की ओर बढ़ रहा था? दरअसल, 2002 में अहमदाबाद की अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगा था। बेरोÊागारी चरम पर पहुंच गई थी। मुंबई-दिल्ली एवं कोलकाता के बाद अहमदाबाद भारत का सबसे बड़ा प्रदूषित शहर था। 

अकल्पनीय कायाकल्प!

हालांकि अब सबकुछ बदल चुका है और अहमदाबाद विश्व में तीसरा तथा भारत का सबसे तेजी से विकसित हो रहा शहर बन गया है। सवाल उठना लाजिमी है कि पिछले साढ़े सात वर्ष में ऐसा क्या हुआ कि आज अहमदाबाद प्रतिष्ठित फोब्र्स पत्रिका की दृष्टि में विश्व का तीसरा और भारत का पहले नंबर का ‘फास्टेस्ट ग्रोइंग सिटी’ बन गया है। 

आने वाले दशक के पॉवर हाउस के रूप में चिन्हित 20 शहरों में भारत के अन्य दो शहर चेन्नई व बेंगलुरु क्रमश: 10 व 15वें पायदान पर हैं। फोब्र्स की रिपोर्ट कहती है कि अहमदाबाद की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से दो गुना है। अहमदाबाद का बीते साढ़े सात सात में पूरी तरह कायाकल्प हो गया है। 

गुजरात को भारत का डायनैमिक एवं मार्केट-फ्रेंडली राज्य क़रार देते हुए फोब्र्स पत्रिका कहती है कि विकासपरक सरकार ने मृतप्राय: अवस्था में पहुंची टैक्सटाइल्स सिटी को डायमंड, फॉर्मास्यूटिकल्स, कैमिकल्स एवं मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का अंतरराष्ट्रीय बिजनेस हब बना दिया है। 

सबकुछ चकाचक

अहमदाबाद को यह रुतबा केवल आर्थिक प्रगति पर आधारित नहीं, बल्कि वैश्वीकरण एवं उदारीकरण के परिप्रेक्ष्य में रोजगार के नए अवसर सृजित करने तथा नागरिकों को सुख-समृद्धि देने के लिए किए गए कार्यो के चलते मिला है। आज इसके पास श्रेष्ठतम कारोबारी बुनियादी संरचना है। 

शहर सबसे अधिक आयकर चुकाता है। संपदा-निर्माण में यह पहले पायदान पर है। स्टॉक मार्केट में मुंबई के बाद सर्वाधिक निवेश अहमदाबाद करता है। ‘लाइफ़ ऑफ्टर वर्क’ एवं ‘लाइफ़ एट वर्क’, इन दोनों इंडेक्स में अहमदाबाद पहले क्रम पर काबिज है। क्लब, कल्चर एवं मल्टीप्लेक्स की भरमार वाले अहमदाबाद में जीवन का ख़र्च मेट्रो और मेगासिटी की तुलना में सस्ता है। 

अहमदाबाद में अंतिम चार साल में कोई महामारी सिर नहीं उठा सकी। फलत: यह भारत में मेडिकल टूरिÊम हब के रूप में उभरा है, वैश्विक स्तर के हॉस्पिटल एवं फाइव स्टार होटल्स का रुख इसकी ओर है। शहर और इसके समीपवर्ती इलाक़ों में रियल एस्टेट बूम पर है। 

खुली जमीन व मकान आदि के भाव में बंपर उछाल है। पश्चिम बंगाल में सिंगूर विवाद के चलते प्रख्यात उद्यमी रतन टाटा की लखटकिया कार नैनो की सवारी साणंद लाने से बड़ी संख्या में बहुराष्ट्रीय कंपनियां (एमएनसी) अपने बिÊानेस सेंटर और कॉपरेरेट अहमदाबाद में स्थापित कर रही हैं। 

मायानगरी मुंबई की तुलना में लक्जरी कार बीएमडब्ल्यू व मर्सिडीज की बिक्री अहमदाबाद में अधिक है। नैनो से लेकर जनरल मोटर्स (जीएम) तक कार निर्माता अहमदाबाद व शहर के आसपास विकसित हो रहे ऑटोमोबाइल रीजन में निवेश कर रहे हैं। 

अदानी से लेकर अंबानी के लिए अहमदाबाद ‘होम पिच’ है, लेकिन एयरबस व बोइंग सरीखी कंपनियां भी इसके पास बनने वाले नए अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के समीप अपने सर्विस सेंटर खोलने की तैयारी में हैं। दुनिया के श्रेष्ठ विश्वविद्यालय और हॉस्पिटल समूह अपनी इकाइयां अहमदाबाद में खोलने के लिए आतुर हैं, लाइन में लगे हैं। 

कैसे हुआ यह

अहमदाबाद का कायाकल्प अनवरत और योजनाबद्घ रणनीति से आगे बढ़ने का परिणाम है। इसमें स्थानीय लोगों से लेकर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तक, सभी ने हर संभव परिश्रम करते हुए अपना-अपना रचनात्मक योगदान दिया है। ‘मरते शहर’ से कोई शहर जिंदादिल-जोशीला कैसे बन सकता है, यह भी एक क़ाबिले तारीफ़ केस स्टडी है। 

शहर की स्थापना की पृष्ठभूमि पर सरसरी नजार डालने से पता चलेगा कि अहमदाबाद की तासीर ही है कि यह किन्ही भी हालात से हार नहीं मानता। 600 साल पहले तत्कालीन बादशाह अहमद शाह साबरमती नदी के किनारे से गुजर रहे थे। उनके घोड़े के आगे शिकारी कुत्ते दौड़ रहे थे, तभी एक खरगोश नजर आया। 

शिकारी कुत्तों ने झपट कर खरगोश को निशाना बनाना चाहा, लेकिन जो हुआ उसे देख कर बादशाह हैरत में पड़ गए, क्योंकि शिकारी कुत्तों को सामने देख खरगोश ने दुम नहीं दबाई और न ही डरा, बल्कि कुत्तों के आगे अड़ गया! इस घटना से गहरे तक प्रभावित बादशाह ने साबरमती के रेत से भरे तट पर शहर बसाने का हुक्म सुना दिया। 

इस घटना को छह सदी का लंबा व़क्त बीत गया है, लेकिन यही इस शहर के जÊबे की कहानी का सूत्र है। अब यही साबरमती तट पर बसा अहमदाबाद शहर अपने अति-महत्वाकांक्षी रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट व स्काईलाइन की दम पर सिंगापुर व मलेशिया से मुकाबला करना चाहता है। 

वर्ष 2000 में नए अहमदाबाद की रूपरेखा अंगूठी (रिंग) के आकार की बनी। 2005 में अहमदाबाद महानगर पालिका (मनपा) की तिजोरी में 260 करोड़ का फंड था तथा 200 करोड़ रुपए विकास कार्यो पर ख़र्च किए जा चुके थे। अब 2010 में यही अहमदाबाद इन्फ्रास्ट्रक्चर पर 10,000 करोड़ रुपए ख़र्च कर रहा है। परिणाम भी सामने है। अंतिम साढ़े चार साल में शहर में डेढ़ लाख करोड़ रुपए का इन्वेस्टमेंट हुआ है। 

योजनाबद्ध विकास 

अहमदाबाद के विकास के लिए सक्र्युलर ग्रोथ प्लान तैयार किया गया है। बेहतरीन प्रशासन एवं श्रेष्ठ इंफ्रास्ट्रक्चर सुनिश्चित करने के लिए शहर से 466 वर्ग किलोमीटर की परिधि में आने वाली 30 ग्राम पंचायतों एवं 20 नगर पालिकाओं का राज्य सरकार ने अहमदाबाद मनपा क्षेत्र में विलय कर दिया। 

इससे सभी सत्ता केंद्र एक स्थान पर केंद्रित हो गए। समूचे शहर के विकास के लिए एक विÊान डॉक्युमेंट तैयार किया गया। प्रगति का ब्लूप्रिंट विशेषज्ञों की सहायता से तैयार किया गया। इसमें भविष्य के अहमदाबाद की जनसंख्या और उसके मुताबिक़ जलप्रदाय, ड्रेनेज, स्टॉर्म वॉटर, परिवहन, स्वास्थ्य, सैनिटेशन एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत आदि बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। 

टाउन प्लानिंग स्कीम में पारदर्शिता रखी गई। अहमदाबाद को मेट्रोसिटी बनाने का संकल्प व्यक्त किया गया। राज्य सरकार ने शहरी एजेंडे में विकास का पूरा रोडमेप बनाया। योजना, नीतियों के सटीक क्रियान्वयन की रूपरेखा भी इसी में स्पष्ट की गई। 

इस ब्लूप्रिंट का फल यह हुआ कि केंद्र सरकार के जवाहर लाल नेहरू नेशनल अर्बन मिशन (जेएनएनयूआरएम) में सबसे अधिक प्रस्ताव अहमदाबाद ने समय पर पेश किए, जिससे 10 हजार करोड़ रुपए का अनुदान मिला। फलत: बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (बीआरटीएस), रिवरफ्रंट डेवलपमेंट, कांकरिया लेक सौंदर्यीकरण, दो रिवरब्रिज, तीन अंडरपास तथा 16 फ्लॉईओवर ब्रिज तीन साल में बन गए। 100 टाउन प्लानिंग स्कीम का क्रियान्वयन हुआ। 

सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्घि की दृष्टि से अहमदाबाद मनपा ने एक नए डेंटल कॉलेज की शुरुआत की। शहर की लगभग 60 लाख की जनसंख्या के लिए 100 वॉटरसप्लाई व ड्रेनेज की व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है। अहमदाबाद 24 घंटे निर्बाध बिजली आपूर्ति करने वाला देश का पहला शहर है।

साबित किया ख़ुद को 

यहां शासन-प्रशासन स्तर पर नई पहल के रूप में ई-गर्वनेंस, ई-बिलिंग, ई-पेमेंट सुविधा शुरू की जा चुकी है। वित्त, प्रबंधन के स्तर पर काम पूरी सतर्कता के साथ किया जा रहा है। परियोजना के क्रियान्वयन के लिए थर्ड-पार्टी इंस्पेक्शन व्यवस्था खुले दिल से अपनाई गई है। 

आईआईएम एवं ऑर्किटेक्ट स्कूल के विशेषज्ञों की मदद से अच्छे तकनीकी व प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति की गई। झुग्गी बस्तियों पर नÊार रखने व पुनर्वास का काम बिना किसी विवाद-विघ्न के पूर्ण हुआ। शहर नियोजन स्कीम हेतु भूमि अधिग्रहण के दौरान भी किसी प्रकार की कानूनी अड़चन पेश नहीं आई। 

पर्यावरण संरक्षण-संवर्धन के प्रति जागरूकता रखते हुए सीएनजी-चलित रिक्शे-बस एवं टैक्सियां शुरू की गईं। लोगों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए सड़क के दोनों ओर पक्की पगडंडिया बनाई गई हैं, जिससे पार्किग की समस्या को नियंत्रित करने में सफलता मिली। 

संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने वाला अहमदाबाद अब स्वच्छ ऊर्जा, हरित भवन की तरफ़ तेÊाी से बढ़ रहा है। अहमदाबाद अब दिल्ली-मुंबई डेडिकेटिड इंटीग्रेटिड कॉरिडोर (डीएमआईसी) व पोर्ट इकॉनिमी संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए सर्विस सेक्टर से लेकर कनेक्टिविटी के नए लक्ष्य को पूरा करने में लगा है। 

डीएमआईसी का लगभग 37 प्रतिशत हिस्सा गुजरात में पड़ता है। डीएमआईसी के राज्य के जिन इलाकों से गुÊार रहा है, उनके आसपास 52 स्पेशल इकॉनोमिक जोन (सेज) एवं छह स्पेशल इकॉनोमिक रीजन (सर) विकसित हो रहे हैं। 

इसी तरह गुजरात 1608 किलोमीटर लंबे समुद्रतट से समृद्ध राज्य है। तटक्षेत्र में छोटे-बड़े 46 बंदरगाह हैं, जिनका ट्रैफिक व व्यापार अहमदाबाद होते हुए होगा। ये दोनों क्षेत्र ही अहमदाबाद का विकास इंजन बनने वाले हैं और अगले दशक में गुजरात को भी पहले नंबर पर आरूढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे। - (लेखक दिव्य भास्कर गुजरात के स्टेट एडीटर हैं

Thursday, November 11, 2010

कमल विहार

कमल विहार पर जो अभी विवाद आया है .. उस की कुछ शासकीय तकनिकी या विभागों के तालमेल में कुछ एक बिन्दुओ  पर तकनीकी खामियों की वजह से मिडिया में जो खबरे आरही है ... इस का समाधान तो जल्दी हो जायेगा मुझे ऐसा लगता है .
पर  मुद्दा ये है की किसान इस का विरोध क्योकर रहे है . जब की जिन लोगो की जमीन कमल विहार में आई है उन को उन की जमीनों की कीमत बहुत ज्यादा मिले है . अब तो खबरे ऐसे आई है की कमल विहार से जो भी लाभ प्राप्त होगा उस को भू - स्वामियों को बाट दिया जायेगा .. यह सच में कुछ ऐसा है तो अच्छी खबर है. 

यदि यह एक कारपोरेट प्रोजेक्ट रहता तो किसान ख़ुशी ख़ुशी आपनी जमीने दे देते क्योकि बाकी की जमीने कम्पनी मनमाने दामो पर खरीद लेती .सरकारी एक रेट फिक्स है बस तकलीफ यहाँ से आना चालू हो गई है की अब आसपास की जमीनों के भाव सरकारी कीमत से दस गुना ज्यादा हो गए है . इस लिए किसान अब विरोध करना चालू कर रहे है .इस में किसान कम और जमीन पर निवेश करने  वाले ज्यादा होंगे.

राजस्व विभाग का कुछ क़ानूनी  मसला तो आपने समझ से परे है !जो जल्दी ही हल हो  जायेगा हम तो यही आशा कर रहे है .
मुझे लगता है , की कमल विहार  की योजना में  जो विवाद है हो रहा है , उस का हल इसी विवाद में ही है .
RDA को ईस कमल विहार योजना के लिए प्रोपर्टी सेक्टर के सलाहकारों से भी सलाह लेनी चाहिए .
कुछ लोगो  से ईस बारे में सुझाव लेने चाहिए .
कुछ नए सलाहकार नियुक्त करना  चहिये 
और भी कुछ बाते है जो लिखी नहीं जा सकती पर समझदारो के द्वारा  सुलझाई जा सकती है ..


(  मै यह लेख जो लिखा है यह मेरी सोच है जो एक छोटी से कहानी की तरह है कृपया इसे वास्तविकता में न )

Wednesday, November 10, 2010

बिलासपुर वासियों के लिए एक खुशखबरी एक तकनीकी सुचना के अनुसार वर्तमान में शहर में प्रति दिन 35 MLD पानी की पूर्ति हो रही है और 30 सालो के बाद बिलासपुर शहर को प्रति दिन 75 से 80 MLD पीने के पानी के जरुरत होगी !

और इतने अधिक पीने के पानी के लिए कम से कम २०० करोड़ से भी ज्यादा का खर्च होगा .और साथ में तकलीफे भी बहुत होंगी...पर हमारी किस्मत अच्छी है की हमारे बिलासपुर से शहर के बिच से से अरपा नदी निकलती है , बिलासपुर के लोगो की किस्मत और भी अच्छी है की हमारे मंत्री जी आपने विदेश दौर का सही उपयोग किया जो लन्दन की टेम्स नदी को देख कर नही आये बल्कि टेम्स नदी को बिलासपुर लाने का सपना भी देख कर आये और अरपा को टेम्स नदी जैसा बनाने के प्रयास में लगे रहे ! जिसका परिणाम अरपा को सवारने के लिए आज अरपा विशेष क्षेत्र प्राधिकरण का गठन हमारे सामने है,श्री अमर अग्रवाल जी ने एक आर्किटेक्ट सोच रखते हुए बिलासपुर में अरपा प्रोजेक्ट को सामने लाया !यह सपने को सच करने जैसा ही है !




बिलासपुर में पर्यटन को बढाने के लिए अरपा प्रोजेक्ट में मनोरंजन के साधनों , मनोरंजन से जुडी योजनाओ का समावेश करके दुगुना किया जा सकता है !अच्नाकमार टाइगर प्रोजेक्ट , पोराणिक धरोहरे , छत्तीसगढ़ का दूसरा बड़ा व्यवसायिक और ओद्योगिक जिला, शहर सब तो है यहाँ .

मैं अरपा प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा समर्थक हु करण तो बहुत से है जिनके बारे मे बाद में चर्चा करूँगा .....
###....मनीष जयसवाल....###

 

Wednesday, November 3, 2010

अरपा विशेष क्षेत्र प्राधिकरण

इस से पहले भी मै अरपा पर ब्लॉग लिख चूका हु चुकी अवसर कुछ ऐसा है जो मैं आपने आप को रोक नहीं पा रहा हु करण यह है की  अरपा विशेष क्षेत्र प्राधिकरण के गठन होना मैंने कई बार इस अरपा प्रोजेक्ट पर कई लोगो से चर्चा की है और यह मेरे लिए भी एक सपने को सच होते देखने जैसा है इस प्रोजेक्ट को को लेकर जो जो बाते मैंने सोची थी वो भी समय के साथ हकीकत में बदलती नज़र आ रही है .. यह प्रोजेक्ट चलू होने से मुझे यह फायदा मिला है की मैंने जिन जिन लोगो के सामने इस प्रोजेक्ट से जुडी बाते कही थी वो सच होते जा रही है


                                              मुझे लगता है की अरपा प्रोजेक्ट कुछ ऐसा ही होगा
                                                 २०२० में कुछ ऐसा लगे गी अरपा नदी  
                                                   अरपा नदी २०२२ में
                                                     Arpa ka kinara 2021 me kuch aisa hoga
                                                        Arpa Bilaspur २०१९ में कुछ इस तरह लगेगी 
                                                 सेंदरी या लोफंदी या फिर घुटकू  में  में कुछ ऐसा नजरो होगा 
                                                 !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
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""सपने सच नहीं होते'' ...पर अमर अगरवाल जी ने सपनों को सच करते हुए यह साबित कर दिया ..( अरपा प्रोजेक्ट) अरपा विशेष क्षेत्र प्राधिकरण के गठन की अधिसूचना जारी होने पर हार्दिक बधाइयाँ...

बिलासपुर का अरपा प्रोजेक्ट मंत्री और विधायक श्री अमर अग्रवाल जी का ड्रीम प्रोजेक्ट है , बिना अग्रवाल जी की सोच के आज अरपा प्रोजेक्ट अस्तित्व में नही आता , अरपा विशेष क्षेत्र प्राधिकरण के गठन की अधिसूचना जारी हो गई है कुछ दिनों में यह राजपत्र में भी प्रकाशित हो जाएगी , इससे बिलासपुर में अरपा प्रोजेक्ट को हरी झंडी मिल गई ... अब बिलासपुर की अरपा नदी भी आने वाले समय में लन्दन की टेम्स नदी जैसा दिखने लगेगी और जैसा विकास लन्दन की टेम्स नदी का हुआ है वैसा विकास बिलासपुर में अरपा का भी होगा ...

यह योजना बिलासपुर के विकास को नयी दिशा देने वाली है , हमें बिलासपुर के विकास के लिए 500 करोड़ से ज्यादा का एक प्रोजेक्ट विधायक और प्रभारी मंत्री श्री अमर अगरवाल जी से मिला है इस को कहते है उमीद से एक हजार गुना अधिक मिलना .........................यह उनकी सोच का परिणाम है एक नए- नए राज्य के गठन के बाद असम्भव सी लगने वाली सोच को श्री अमर अग्रवाल जी ने कागजो में उतारा फिर कागजो से निकल कर उस को अस्तित्व लाया जो आज अरपा विशेष क्षेत्र प्राधिकरण बिलासपुर के रूप में हमारे सामने आ रही है !